- ज़ाहिद ख़ान
जगजीत सिंह को इस दुनिया से रुख़्सत हुए एक दशक से ज़्यादा हो गया है, लेकिन उनके द्वारा गायी हुई ग़ज़लें, नग़में, शबद कीर्तन और भजन उनकी याद दिलाती हैं। ग़ज़ल गायन में उन्हें जो देश-दुनिया में शोहरत मिली, उस मुक़ाम तक कोई नहीं पहुंच पाया है। वेलवेट वॉयस यानी मख़मली आवाज़ के मालिक और ग़ज़ल गायकी का एक अनोखा अंदाज़ जगजीत सिंह को ख़ास बनाता था। उन्होंने अपनी पुर-सोज़ आवाज़ में जो भी गाया, उसे अमर कर दिया।
देश-दुनिया में लाखों लोग जगजीत सिंह की ग़ज़ल गायकी के मुरीद थे और आज भी उनका यह जादू कम नहीं हुआ है। उनकी एक नहीं, बल्कि कई ऐसी फ़िल्मी-ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें हैं जो उनके चाहने वालों के हर दम लबों पर रहती हैं। 'होठों से छू लो तुम मेरा..', 'तुम इतना जो मुस्करा रहे हो', 'तुमको देखा तो ये ख़याल आया', 'चिठ्ठी न कोई संदेश, जाने वो..', 'वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी', 'मैं रोया परदेश में भीगा मां का प्यार', 'सरकती जाए है रुख से नक़ाब आहिस्ता', 'होश वालों को ख़बर क्या', 'झूम के जब रिंदों ने पिला दी', और 'हुजूर आपका भी एहतराम करता चलूं' जगजीत सिंह की गायी यह कुछ ऐसी नायाब ग़ज़लें है, जो बीते पांच दशकों से लोगों को अपना दीवाना बनाए हुए हैं। उनकी मक़बूलियत जरा सी भी कम नहीं हुई है। उन्होंने हर दौर और हर उम्र के लोगों के दिलों पर अपनी गायकी के गहरे अक्स छोड़े हैं।
जगजीत सिंह की दिल-आवेज़ शख़्सियत, जादुई ग़ज़ल गायकी और उनकी हंगामाख़ेज़ ज़िंदगी के बारे में काफ़ी कुछ लिखा गया है और आज भी यह सिलसिला कम नहीं हुआ है। जगजीत सिंह के चाहने वाले उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहते हैं। ज़ाहिर है कि इन्हीं सब बातों का ख़याल रखकर वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और बायोपिक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक राजेश बादल ने जगजीत सिंह की एक शानदार जीवन गाथा 'कहाँ तुम चले गए...दास्तान-ए-जगजीत' लिखी है। बादल खु़द भी जगजीत की ग़ज़ल गायकी के मुरीद और शैदाई रहे हैं। लेखक का ये दीवानापन उनकी इस किताब में भी दिखाई देता है। उन्होंने बड़े ही मुहब्बत और जतन से किताब को तैयार किया है। एक लिहाज से कहें, तो यह जगजीत सिंह की ज़िंदगी पर शोधपरक किताब है, जिसे उन्होंने जगजीत सिंह के परिवार वालों, रिश्तेदारों, सहयोगियों और दोस्तों से बातचीत कर दिल की गहराईयों से लिखा है। उनके लिखने का तरीक़ा कुछ ऐसा है कि जैसे वे पाठकों से गुफ़्तगू कर रहे हों। सहज, सरल ज़बान और बतकही का ये अंदाज़ किताब को पठनीय बनाता है।
दरअसल, राजेश बादल बरसों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से वाबस्ता रहे हैं। उसकी ज़बान, लहजे और मुहावरे से अच्छी तरह से वाकि़फ़ हैं। और यही तजुर्बा उनकी इस किताब में काम आया है। राज्यसभा टीवी में काम करने के दौरान उन्होंने 'उनकी नज़र' और 'उनका शहर और विरासत' के तहत पचास से ज़्यादा हस्तियों पर शानदार बायोपिक बनाई हैं। यही नहीं जगजीत सिंह पर तो राजेश बादल ने एक-एक घंटे की पांच फ़िल्में बनाई थीं, जो उस वक़्त दर्शकों को काफ़ी पसंद आई थीं। एक तरह से कहें, तो जगजीत सिंह और उनकी ज़िंदगी के बारे में उनके पास पहले ही बहुत बड़ा ख़ज़ाना था। इस बेशक़ीमती ख़ज़ाने में से ही उन्होंने कुछ मोती चुनकर किताब 'कहाँ तुम चले गए...दास्तान-ए-जगजीत' बुनी है। किताब वाक़ई बहुत अच्छी बन गई है। जगजीत सिंह के छोटे भाई ग़ज़ल गायक करतार सिंह ने किताब की भूमिका में खु़द ये माना है कि ''इस किताब से पहले इस महान कलाकार के सफ़रनामे पर हिंदी में कोई समग्र काम नहीं हुआ है।'' ज़ाहिर है कि इस सनद के बाद कोई बात कहने को नहीं रह जाती। जगजीत सिंह का यह एक प्रमाणिक ज़िंदगीनामा है, जो दिल से लिखा गया है।
किताब चौदह हिस्सों में है। इन हिस्सों में लेखक ने जगजीत सिंह के बचपन से लेकर उनके लिविंग लीजेंड बनने तक के दिलचस्प सफ़र की दास्तान को बड़े ही हुनरमंदी से क़लम—बंद किया है। उनके बारे में कई अनूठी जानकारियां पाठकों को जुटाई हैं। मसलन जगजीत सिंह को उनके वालिद ने मौसीक़ी की तालीम इसलिए दिलवाई थी कि वे गुरबानी का पाठ शास्त्रीय संगीत में अच्छी तरह से कर सकें। आकाशवाणी जालंधर की स्वर परीक्षा में जगजीत सिंह शास्त्रीय संगीत में तो पास हो गए, मगर उप शास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत परीक्षा में फ़ेल हो गए थे। हिंदी सिनेमा के जाने-माने निर्माता-निर्देशक सुभाष घई, संगीतकार कुलदीप सिंह और शायर सुदर्शन 'फ़ाकि़र' जगजीत सिंह के गर्दिश के दिनों के साथी थे और उन्होंने भी फ़िल्मी दुनिया में अपना मुक़ाम बनाने के लिए उनके साथ स्ट्रगल किया था।
फ़िल्मी दुनिया में जगजीत सिंह को सबसे पहले मौक़ा फ़िल्म 'अमन' में एक्स्ट्रा कलाकार के तौर पर मिला था, न कि सिंगर के रूप में। एक मशहूर संगीत कंपनी की शर्त से मजबूर होकर जगजीत सिंह ने अपना सिख वेश त्यागा था। ग़ज़ल गायकी के लिए उन्होंने अपनी दाढ़ी और पगड़ी को भी कु़र्बान कर दिया था। जगजीत सिंह की शरीक-ए-हयात चित्रा सिंह, जिन्होंने जगजीत के साथ तीन दर्जन से ज़्यादा ग़ज़ल एलबमों में साथ गाया, को उनकी आवाज़ और गायन पसंद नहीं था। एक तरह से उन्होंने जगजीत सिंह को खारिज़ ही कर दिया था। 'अनफॉरगेटेबल्स' वह ग़ज़ल एलबम थी, जिससे जगजीत-चित्रा को रातों-रात स्टार बन गए। और इस एलबम ने ग़ज़ल की दुनिया में इंक़लाब ला दिया था। ग़ज़ल की कैसेट के कवर के साथ ग़ज़लों (उर्दू के कठिन लफ़्ज़ों के हिंदी अनुवाद के साथ) को भी लिखवाने का सिलसिला जगजीत सिंह ने ही शुरू किया था।
ताकि आम आदमी भी इन ग़ज़लों को अच्छी तरह से समझ सकें। मौजूदा दौर के कई मशहूर ग़ज़ल गायक तलत अज़ीज़, अशोक ख़ोसला, घनश्याम वासवानी, विनोद सहगल, रूप कुमार राठौर, सीमा शर्मा, सुमिता चक्रवर्ती वग़ैरह को जगजीत सिंह ने एलबम 'टैलेंट्स ऑफ एटीज़' में म्यूजिक देकर इंट्रोड्यूस किया था।
जगजीत सिंह को अपने ग़ज़ल गायन से दुनिया भर में बेशुमार शोहरत मिली मगर उनकी ज़िंदगी का उत्तरार्ध बड़ी तकलीफ़ और रंज-ओ-ग़म के साथ बीता। उनके इकलौते बेटे विवेक की कार एक्सीडेंट में दर्दनाक मौत और उसके कुछ साल बाद उनकी बेटी मोनिका का असमय इस दुनिया को छोड़कर जाना, जगजीत और चित्रा दोनों को तोड़कर रख दिया था। लेखक ने इन परेशान-कुन वाकि़आत और संगीन हालात को भी बड़े ही संजीदगी से किताब में बयान किया है। किसी फ़िल्म की तरह किताब के ज़रिए यह सारा मंज़र हमारी आंखों के सामने आता है। कुछ इसी तरह का एहसास 'ज़िंदगी की जंग' अध्याय पढ़कर होता है। जिसमें राजेश बादल ने ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रहे जगजीत सिंह के आख़िरी दिनों का ब्यौरा दिया है।
किताब में जहां जगजीत सिंह की दिलचस्पियों और शौक़ मालूम चलते हैं, तो वहीं उनका रहमदिल और हर एक को मदद करने वाला मिज़ाज भी सामने आता है। किस तरह वे दरियादिली से लोगों की मदद करते थे। अपने परिवार, रिश्तेदार, क़रीबी लोगों से लेकर सामाजिक संस्थाओं की उन्होंने मदद की। ज़रूरत के वक़्त उनका सहारा बने। किताब के आख़िरी अध्याय 'जन जन का जगजीत' में लेखक ने जगजीत सिंह से अपने मरासिम और उनके साथ हुई औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत को शामिल किया है। जिसमें हमें जगजीत सिंह की ग़ज़ल गायकी, गायकी के लिए ग़ज़लों का इंतिख़ाब, अपने संगीत में पश्चिमी वाद्य यंत्रों के इस्तेमाल आदि कई सवालों पर तफ़्सील से उनके ख़यालात मालूम चलते हैं। जगजीत सिंह के शैदाईयों के लिए किताब 'कहाँ तुम चले गए...दास्तान-ए-जगजीत' सचमुच एक सौगात है, जिसे वे हर दम सहेज कर रखना चाहेंगे।
मंजुल पब्लिशिंग हाउस की दीगर किताबों की तरह इस किताब का भी प्रोडक्शन बहुत ही उम्दा है। किताब की छपाई से लेकर इसमें इस्तेमाल हुआ कागज़ भी अच्छी क्वालिटी का है। बीच-बीच में इस्तेमाल की गईं ब्लैक एडं व्हाइट और रंगीन तस्वीरों से भी किताब का आकर्षण बढ़ गया है।